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हम जो कभी लिखे नहीं गए

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Chapter 1 - ham jo kabhi likhe nahi gaye

हम किसी कहानी में पैदा नहीं हुए थे, इसलिए शायद हमें कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि हमारी ज़िंदगी भी लिखे जाने लायक है। हम सुबह उठते थे, दिन काटते थे और रात को सो जाते थे, बिना यह सोचे कि कल कोई हमें याद करेगा या नहीं। हमारे नाम अख़बारों में नहीं आए, हमारी तस्वीरें पोस्टरों पर नहीं लगीं, और हमारे फैसलों पर तालियाँ भी नहीं बजीं। फिर भी हम ज़िंदा थे, और शायद इसी वजह से हमारी कहानी सबसे अलग थी।

हम एक ऐसे गाँव से आते हैं जहाँ रास्ते कच्चे हैं लेकिन यादें पक्की हैं। यहाँ लोग भविष्य की बातें कम करते हैं और आज की ज़रूरतों पर ज़्यादा ध्यान देते हैं। यहाँ हर घर में कोई न कोई सपना ज़रूर है, पर वह सपना अक्सर ज़ुबान से बाहर नहीं आता। लोग कहते हैं कि सपने बोलने से पूरे होते हैं, पर हमारे यहाँ सपने चुप रहकर ज़्यादा देर तक टिके रहते हैं।

हम सब एक जैसे नहीं थे, लेकिन हमारी परेशानियाँ लगभग एक जैसी थीं। किसी के पास ज़मीन कम थी, किसी के पास काम, किसी के पास समय और किसी के पास हिम्मत। फिर भी हम हर शाम एक ही जगह इकट्ठा होते थे, पीपल के पुराने पेड़ के नीचे, जहाँ बैठकर दुनिया बहुत दूर लगती थी और अपने लोग बहुत पास। वहाँ कोई बड़ा नहीं था, कोई छोटा नहीं था, बस कुछ लोग थे जो दिन भर की थकान लेकर बैठे होते थे।

एक दिन उन्हीं बैठकों में से एक बैठक में किसी ने सवाल पूछ लिया। सवाल छोटा था, पर उसके अंदर बहुत शोर था। उसने कहा कि अगर हम सब ऐसे ही जीते रहे तो क्या हमारी ज़िंदगी कभी बदलेगी। सवाल सुनते ही किसी ने हँसकर टाल दिया, किसी ने ज़मीन की तरफ देखा और किसी ने आसमान की तरफ। किसी के पास जवाब नहीं था, क्योंकि जवाब देने के लिए पहले यकीन होना चाहिए, और हम यकीन करना भूल चुके थे।

हम में से एक लड़का उस दिन बहुत देर तक चुप रहा। वह हमेशा कम बोलता था, इसलिए उसकी चुप्पी किसी को अजीब नहीं लगी। लेकिन उसी चुप्पी में एक फैसला पल रहा था। कुछ दिनों बाद पता चला कि वह शहर जा रहा है। किसी ने रोका नहीं, किसी ने टोका नहीं, क्योंकि हम सब जानते थे कि अगर कोई जाने का मन बना ले, तो उसे रोकना सिर्फ उसकी तकलीफ़ बढ़ाना होता है।

उसके जाने के बाद कुछ समय तक सब वैसा ही चलता रहा। खेत वैसे ही सूखते और हरे होते रहे, लोग वैसे ही हँसते और चुप होते रहे। बस फर्क इतना था कि अब पीपल के पेड़ के नीचे एक जगह खाली रहने लगी थी। शुरुआत में किसी ने उस खाली जगह पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन धीरे-धीरे वह जगह हमें देखने लगी।

शहर से उसके फोन आते थे। वह कहता था कि सब ठीक है, काम मिल गया है, लोग अच्छे हैं। हम उसकी बातों पर भरोसा कर लेते थे, क्योंकि हमें भरोसे की ज़रूरत थी। लेकिन उसकी आवाज़ में जो कमी थी, उसे हम समझना नहीं चाहते थे। हम चाहते थे कि वह सफल हो, ताकि हमें लगे कि हममें से कोई तो निकला।

समय के साथ फोन कम होते गए। पहले हफ्तों में, फिर महीनों में। आखिरकार सिर्फ त्योहारों पर एक छोटा सा संदेश आने लगा। "ठीक हूँ।" बस इतना ही। न ज़्यादा, न कम। उस "ठीक हूँ" में बहुत कुछ छुपा था, लेकिन पढ़ने वाला कोई नहीं था।

एक साल बाद वह अचानक वापस आ गया। न कोई खबर, न कोई तैयारी। वह उसी रास्ते से गाँव में दाखिल हुआ, जैसे कभी निकला था। पर इस बार उसके कदमों में जल्दी नहीं थी। वह सीधे खेतों की तरफ गया और वहीं खड़ा हो गया, बहुत देर तक। जैसे वह देख रहा हो कि क्या कुछ बदला है या सब वैसा ही है।

शाम को जब वह हमारे सामने आया, तो किसी ने सवाल नहीं पूछा। शायद इसलिए कि हम सवालों से डरने लगे थे। कुछ देर बाद उसने खुद ही बोलना शुरू किया। उसने कहा कि शहर ने उसे बहुत कुछ दिया, पर उससे ज़्यादा उससे छीना। उसने कहा कि वहाँ लोग नाम पूछते हैं, हाल नहीं। उसने कहा कि वहाँ भीड़ होती है, पर अपनापन नहीं।

उसकी बातें सुनकर हमें कोई हैरानी नहीं हुई। शायद इसलिए कि हम यह सब पहले से जानते थे, बस मानना नहीं चाहते थे। उस दिन पहली बार हमें यह समझ आया कि बाहर जाना हमेशा आगे बढ़ना नहीं होता। कभी-कभी रुक जाना भी एक तरह की जीत होती है।

उसके लौटने के बाद हमारी शामें थोड़ी बदल गईं। अब बातें ज़्यादा होने लगीं। सपनों का ज़िक्र भी होने लगा, हालाँकि अब भी धीरे-धीरे। हम समझने लगे थे कि हर किसी को शहर नहीं जाना होता, और हर किसी को गाँव में रहकर हारना भी नहीं होता।

हमने छोटे-छोटे बदलाव शुरू किए। किसी ने नई फसल आज़माई, किसी ने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, किसी ने मोबाइल पर दुनिया देखनी शुरू की, बिना खुद को खोए। हमें यह नहीं पता था कि इससे हमारी ज़िंदगी कितनी बदलेगी, लेकिन इतना ज़रूर पता था कि हम कोशिश कर रहे हैं।

आज भी हम वही लोग हैं। हमारे कपड़े महंगे नहीं हुए, हमारे घर बड़े नहीं हुए, लेकिन हमारी सोच में थोड़ी जगह बन गई है। हम अब खुद को कम नहीं समझते। हमें पता है कि हमारी कहानी शायद कभी ट्रेंड न करे, लेकिन अगर कोई ध्यान से सुने, तो उसे इसमें सच्चाई मिलेगी।

हम कोई मिसाल नहीं हैं, कोई हीरो नहीं हैं। हम बस वो लोग हैं जो हर दिन उठते हैं, काम करते हैं, गिरते हैं, संभलते हैं और फिर अगले दिन वही सब दोहराते हैं। लेकिन अब हम यह जानते हैं कि हमारी ज़िंदगी बेकार नहीं है, सिर्फ इसलिए कि वह किसी किताब में नहीं छपी है ham kamjor nahi hote ham kamjor banjate hai

अगर कभी कोई पूछे कि हम कौन हैं, तो हम कहेंगे कि हम वही हैं जिनके बारे में कोई नहीं लिखता, इसलिए आज हमने खुद को लिख लिया। बिना सजावट, बिना बढ़ा-चढ़ाकर, जैसे हम हैं, वैसे ही। और शायद इसी वजह से हमारी कहानी कॉपी नहीं लगती, क्योंकि यह बनाई नहीं गई, थीं