अध्याय 1: घड़ीघर की परछाइयाँ
पुराने शहर के बीचों-बीच एक ऊँचा-सा घड़ीघर खड़ा था। उसकी सुइयाँ रोज़ समय बताती थीं, लेकिन लोगों का मानना था कि वह सिर्फ़ समय नहीं, राज़ भी छुपाए हुए है। शाम होते ही घड़ीघर की घंटियाँ कुछ अलग-सी लगतीं—जैसे कोई अनसुनी कहानी हवा में तैर जाती हो।
आरव पहली बार उस शहर में आया था। वह अपने मामा के घर छुट्टियाँ बिताने आया था, और आते ही उसकी नज़र घड़ीघर पर टिक गई। पत्थरों पर उगी काई, टूटे किनारे, और ऊपर जमी धूल—सब कुछ बहुत पुराना था। मगर सबसे अजीब बात यह थी कि रात ठीक बारह बजे घड़ी की आवाज़ बाकी समय से अलग हो जाती थी।
"यह घड़ीघर बंद क्यों रहता है?" आरव ने मामा से पूछा।
मामा मुस्कुराए, लेकिन आँखों में हल्की-सी चिंता झलक गई।
"क्योंकि कुछ दरवाज़े ऐसे होते हैं, जिन्हें बंद ही रहना चाहिए।"
यह बात आरव के मन में गूंजती रही।
अगली शाम वह अपनी दोस्त मीरा के साथ घड़ीघर के पास पहुँचा। सूरज ढल रहा था और परछाइयाँ लंबी होती जा रही थीं। तभी आरव ने देखा—घड़ीघर की दीवार के नीचे एक पत्थर हल्का-सा हिला हुआ था।
मीरा ने फुसफुसाकर कहा, "क्या तुमने भी देखा?"
आरव ने सिर हिलाया। उसका दिल तेज़ धड़कने लगा।
क्या यह सिर्फ़ एक इत्तेफ़ाक़ था…
या घड़ीघर के नीचे सच में कोई रहस्य छुपा था?
दूर कहीं से घड़ी ने एक बार फिर घंटी बजाई।
डोंग…
और उसी पल, आरव को लगा—यह कहानी अब शुरू हो चुकी है।
अगर चाहो तो मैं अध्याय 2 और भी ज़्यादा रहस्यमय बना सकता हूँ 😌📖
