वो जगह फिर से दिखाई दी…
हम सब मुख्य सड़क पर पहुँचकर थोड़ा शांत हो गए थे।
कोहरा भी अब धीरे-धीरे कम होने लगा था और आसमान हल्का सा नीला दिखने लगा था।
हम सबने सोचा कि शायद जो कुछ हमने देखा था, वह डर और थकान की वजह से हमें ऐसा लग रहा था।
लेकिन मेरे दिल में अभी भी एक अजीब सा डर था।
मैंने अपने दोस्तों से कहा,
"क्या तुम्हें सच में लगता है कि वो आदमी सिर्फ हमारा भ्रम था…?"
सूरज ने धीरे से कहा,
"मुझे नहीं पता… लेकिन जो हमने देखा था, वो बिल्कुल सच जैसा लग रहा था।"
हम सब धीरे-धीरे अपने घरों की तरफ जाने लगे।
लेकिन तभी अचानक मैंने पीछे मुड़कर देखा…
और जो मैंने देखा, उसे देखकर मेरी सांस रुक गई।
दूर, उसी रास्ते पर जहाँ से हम अभी आए थे,
वही चाय की टपरी फिर से दिखाई दे रही थी।
लेकिन इस बार कुछ अलग था…
वहाँ कोई भी नहीं था।
न कोई आदमी… न कोई आवाज़…
सिर्फ टपरी के अंदर एक लाल रंग की हल्की रोशनी जल रही थी।
मैंने अपने दोस्तों को आवाज़ दी,
"उधर देखो… वही चाय की टपरी…"
सबने पीछे मुड़कर देखा।
लेकिन जैसे ही हम सबने ध्यान से देखा…
वो टपरी धीरे-धीरे कोहरे में गायब होने लगी।
अब हम सबको समझ आ गया था कि जो कुछ उस सुबह हुआ था, वह कोई साधारण बात नहीं थी।
और तभी मेरे दोस्त प्रियांशु ने धीरे से कहा —
"अगर वो आदमी… इंसान नहीं था…
तो फिर वो क्या था…?"
उस सवाल का जवाब…
आज तक हमें नहीं मिला। kahani pasand aayi to comment karna na bhul taki me aagla part jaldi lao
