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काकी

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Chapter 1 - ( KAKI / काकी ) काकी की कहानी Amazing and Hurt touching ❤️

( इस कहानी में एक नादान बालक अपनी मां के प्रति गहरा प्रेम को प्रकट करता हैं)

एक दिन बड़े सबेरे रामू की नींद खुली तो उसने देखा घर भर में शोर - गुल मचा हुआ है । उसकी मां नीचे से ऊपर तक एक कपड़ा ओढ़े हुए कंबल पर भूमि - शयन कर रही है और घर के सब लोग उसे घेर कर बड़े दुखी स्वर में रो रहे है ।

लोग जब उसकी मां को श्मशान ले जाने के लिए उठाने लगे ,तब रामू ने बड़ा उपद्रव मचाया । लोग के हाथ से छुटकर मां के ऊपर जा गिरा । बोला , काकी सो रही है । इसे इस तरह उठा कर कहा ले जा रहे हो ? मैं इसे नहीं ले जाने दूंगा ।

लोगो ने बड़े कठिनाई से उसे हटाया । काकी के अग्नि - संस्कार में भी वह नहीं जा सका । एक दासी राम - राम करके उसे घर पे ही संभाले रही ।

यद्यपि बुद्धिमान गुरु जी ने उसे विश्वास दिलाया कि उसकी काकी उसके मामा के यहां गई है। लेकिन यह बात उससे छिपी न रह सकी की काकी और कहीं नहीं ऊपर राम के यहां गई है। काकी के लिए कई दिन लगातार रोते-रोते उसका रोना तो धीरे-धीरे शांत हो गया, लेकिन शोक शांत न हो सका । वह अक्सर अकेला बैठ कर शांत मन से आकाश की ओर देखा करता।

एक दिन उसने ऊपर आकाश में एक पतंग उड़ती देखी। न जाने क्या सोचकर उसका हृदय एकदम खिल उठा। पिता के पास जाकर बोला ,' काका, मुझे एक पतंग मंगा दो, अभी मंगा दो। '

पत्नी की मृत्यु के बाद से कमलेश बहुत अनमने - से रहते थे । ' अच्छा मंगा दूंगा, ' कहकर वे उदास भाव से और कहीं चले गए। रामू पतंग के लिए बहुत उत्सुक था। वह अपनी इच्छा को किसी तरह नहीं रोक सका। एक जगह खूंटी पर कमलेश का कोट टंगा था। इधर-उधर देखकर उसने पास रखें टेबल सरका कर रखा और उपर चढकर कोट की जेबें ढूंढा ।

एक रुपया पाकर वह वहां से तुरंत भाग गया । शीतला दासी का लड़का मोनू , रामू का साथी था। रामू ने उसे एक रुपया देकर कहा , ' अपनी दीदी से कहकर चुपचाप एक पतंग और डोर मंगा दो। देखो अकेले में लाना कोई जान ना पाए। '

पतंग आई । एक अंधेरे घर में डोर बांधी जाने लगी। रामू ने धीरे से कहा, ' मोनू , किसी से ना कहो तो एक बात कहूं।

मोनू ने सिर हिलाकर कहा ' नहीं , किसी से नहीं कहूंगा।'

रामू ने रहस्य खोला, ' मैं यह पतंग ऊपर राम के यहां भेजूंगा। इसको पकड़ कर काकी नीचे उतर जाएंगी । मैं लिखना नहीं जानता नहीं तो इस पर उनका नाम लिख देता। '

मोनू रामू से अधिक समझदार था। उसने कहा, ' बात तो बहुत अच्छी सोची है, परंतु एक कठिनाई है। यह डोर पतली है। इसे पड़कर काकी उतर नहीं सकती। इसके टूट जाने का डर है। पतंग में मोटी रस्सी हो तो सब ठीक हो जाएगा।

रामू गंभीर हो गया। मतलब यह बात लख रुपए की सुझाई गई, लेकिन कठिनाई यह भी थी की मोटी रस्सी कैसे मंगाई जाए। पास में पैसे है नहीं और घर के जो आदमी उसकी काकी को बिना दया-मया के जला आए हैं, उसे वे इस काम के लिए कुछ देंगे नहीं। उस दिन रामू को चिंता के मारे बड़ी देर रात तक नींद नहीं आई।

पहले दिन की ही तरकीब से दूसरे दिन फिर उसने पिता के कोट से एक रुपया निकाला। ले जाकर मोनू को दिया और बोला, ' देख मोनू, किसी को मालूम ना हो पाए । अच्छी-अच्छी दो रस्सियां मंगा दे। एक रस्सी छोटी पड़ेगी। हीरा भैया से मैं एक कागज पर ' काकी ' लिखवा लूंगा। नाम लिखा रहेगा तो पतंग ठीक उन्हीं के पास पहुंच जाएगी।

दो घंटे बाद खुशी मन से रामू और मोनू अंधेरे कोठरी में बैठे हुए पतंग में रस्सी बांध रहे थे। अचानक गुस्से का रूप धारण किए हुए कमलेश शुभ कार्य में बाधा की तरह वहां जा घुसे। रामू और मोनू को धमका कर बोले — 'तुमने हमारे कोर्ट से रूपया निकाला है ?'

मोनू एक ही डाट में डर गया। बोला, ' रामू भैया ने रस्सी और पतंग मंगाने के लिए निकाला था। '

कमलेश ने रामू को दो तमाचे जड़कर कहा, ' चोरी सीख कर जेल जाएगा ! अच्छा, तुझे आज अच्छी तरह बताता हूं।'

कहकर कई तमाचे जड़े और कान मलने के बाद पतंग फाड़ दी। अब रस्सियों की ओर देखकर पूछा ' यह किसने मंगाई।'

मोनू ने कहा, ' इन्होंने मंगाई थी। कहते थे, इससे पतंग उड़ा कर काकी को राम के यहां से नीचे लाएंगे ।'

कमलेश हदबुद्धि होकर वहीं खड़े रह गए। उन्होंने फटी हुई पतंग उठाकर देखी , तो उसे पर चिपके हुए कागज पर लिखा

था . . . ."काकी"।

— सर्वेश वर्मा

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